किसान की बेटी ने रचा इतिहास! कौन हैं निगार शाजी, जिनके नेतृत्व में सूर्य नमस्कार करने पहुंचा आदित्य
कौन हैं ISRO की वैज्ञानिक निगार शाजी, जिन्होंने भारत के पहले सूर्य मिशन आदित्य एल-1 को सफल बनाया।
- टेक्नोलॉजी
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Nigar Shaji Aditya L1 Sun Mission: भारत की स्पेस एजेंसी इसरो (ISRO) ने 6 जनवरी 2024 को सूर्य मिशन में बड़ी सफलता हासिल की। इसरो ने भारत के सूर्य मिशन आदित्य एल-1 को हेलो ऑर्बिट में करा दिया है। ये भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धी है। हेलो ऑर्बिट में स्थापित होने के बाद से अब अगले 5 सालों तक एल-1 प्वाइंट पर ही रहेगा। वहीं से सूर्य का अध्ययन करेगा। लेकिन क्या आपको पता है कि इसरो की इस उपलब्धी का श्रेय किसान की बेटी निगार शाजी को जाता है।
खबर में आगे पढ़ें:
- कौन हैं निगार शाजी?
- 126 दिन पहले लॉन्च किया गया था आदित्य एल-1
- 126 दिन बाद हेलो ऑर्बिट में आदित्य एल-1 स्थापित
निगार शाजी इसरो के सूर्य मिशन आदित्य एल-1 की डायरेक्टर है। उन्होंने ने ही इस मिशन को लैंगरंग (L) प्वाइंट पर आदित्य एल-1 को स्थापित करने का नेतृत्व किया। इस मिशन को सफल बनाने के लिए शाजी ने 8 साल तक अपनी टीम के साथ जी तोड़ मेहनत की।
1987 में शाजी बनीं इसरो की सदस्य
निगार शाजी 1987 में इसरो में शामिल हुईं। और अब वो भारत के पहले सफल सूर्य मिशन की डायरेक्टर बन गई हैं। इससे पहले निगार रिसोर्ससैट-2ए की सहयोगी परियोजना निदेशक थीं, जो अभी भी चालू है। निगार सभी निचली कक्षा और ग्रहीय मिशनों की कार्यक्रम निदेशक भी हैं। पहले तो इन्होंने इसरो में श्री हरिकोटा अंतरिक्ष बंदरगाह पर काम की शुरुआत की, फिर बाद में उन्हें बेंगलुरु के यूआर राव सैटेलाइट सेंटर भेज दिया गया।
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शाजी एक किसान परिवार से आती हैं। स्कूली शिक्षा सेनगोट्टई से पूरी करने के बाद इन्होंने मदुरै कामराज यूनिवर्सिटी के तिरुनेलवेली के इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया। यहां इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार में इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। मास्टर की डिग्री के लिए शाजी ने बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, मेसरा में एडमिशन लिया, जहां उनका स्ट्रीम इलेक्ट्रॉनिक्स था।
5 सालों में सूर्य की अलग-अलग सतहों का अध्ययन
अगले 5 सालों में L-1 प्वाइंट से भारत का मिशन सोलर एक्टिविटी और सूर्य की अलग-अलग सतहों का अध्ययन करने वाला है। इसरो की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार एल1 प्वाइंट के चारों ओर जो हेलो ऑर्बिट है उसकी वजह से बिना किसी ग्रहण के सूर्य का लगातार अध्ययन किया जा सकेगा। इससे वास्तविक समय में सौर गतिविधियों और अंतरिक्ष मौसम पर इसके प्रभाव को देखने में अधिक लाभ मिलेगा।